भक्ति और शौर्य की परंपरा: धनगर समाज का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक इतिहास
धनगर (गाडरी / गायरी) समाज का इतिहास
संत परंपरा, आध्यात्मिक विरासत और गौरवशाली राजकीय योगदान
धनगर, गाडरी और गायरी समाज का इतिहास भारतीय सभ्यता के सबसे प्राचीन और समृद्ध इतिहासों में से एक है। यह समाज केवल पशुपालन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आध्यात्मिक साधना, संत परंपरा, समाज सुधार और शासन व्यवस्था में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक धनगर समाज ने ऐसे संत, महापुरुष और शासक दिए हैं, जिन्होंने समाज को दिशा देने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को भी सशक्त किया।
धनगर समाज का इतिहास वास्तव में भक्ति, शक्ति और सेवा—तीनों का संगम है।
धनगर समाज की आध्यात्मिक परंपरा
धनगर समाज की पहचान उसकी मजबूत आध्यात्मिक परंपरा से होती है। इस समाज के संतों ने केवल ईश्वर भक्ति का मार्ग नहीं बताया, बल्कि समाज को शिक्षित, संगठित और नैतिक रूप से मजबूत बनाने का कार्य भी किया।
इन संतों की शिक्षाओं में जीव-दया, पशु-प्रेम, समानता, नशा-मुक्ति और सामाजिक सद्भाव प्रमुख रहे हैं।
प्राचीन एवं ऐतिहासिक काल के धनगर समाज के संत
महारानी अहिल्याबाई होलकर – आदर्श शासिका और धर्म स्थापिका
महारानी अहिल्याबाई होलकर का जन्म महाराष्ट्र के चौंढी ग्राम में हुआ। वे होलकर वंश की महान शासिका थीं और इंदौर व महेश्वर उनका प्रमुख शासन क्षेत्र रहा।
उन्हें ‘राजर्षि’ कहा जाता है क्योंकि उन्होंने शासन को सेवा और धर्म से जोड़ा।
उनके शासनकाल की प्रमुख विशेषताएँ थीं:
न्यायप्रिय और लोककल्याणकारी प्रशासन
भारत भर में सैकड़ों प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार
शिव भक्ति और धार्मिक सहिष्णुता
धनगर समाज की राजकीय क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण
संत श्री लिखमीदास जी – निर्गुण भक्ति के महान संत
संत श्री लिखमीदास जी का जन्म राजस्थान के नागौर जिले के अमरपुरा क्षेत्र में हुआ। उनका कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से नागौर और मारवाड़ रहा।
वे मध्यकालीन निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रमुख संत माने जाते हैं।
उनकी साधना का मूल भाव था:
वीर बाबाजी – धनगर समाज के लोकदेवता
वीर बाबाजी को मालवा और मेवाड़ क्षेत्र में धनगर समाज का लोकदेवता माना जाता है।
प्राचीन काल से ही वे समाज के रक्षक देव के रूप में पूज्य रहे हैं, विशेष रूप से पशुपालक और ग्रामीण समुदाय के लिए।
उनकी लोकमान्यता यह दर्शाती है कि धनगर समाज में आस्था और संस्कृति लोकजीवन से गहराई से जुड़ी हुई है।
आधुनिक काल के धनगर समाज के प्रमुख संत
मध्यप्रदेश एवं राजस्थान
संत श्री अमराजी भगत – मेवाड़ के कबीर
संत श्री अमराजी भगत का संबंध चित्तौड़गढ़ जिले के भदेसर क्षेत्र से रहा। अनगढ़ बावजी उनका प्रमुख धाम रहा।
वे समाज सुधार और आध्यात्मिक जागरण के लिए प्रसिद्ध हुए और उन्हें “मेवाड़ का कबीर” कहा जाता है।
संत श्री मंगलदास जी महाराज – नशा मुक्ति और गौ-सेवा के प्रेरक
संत श्री मंगलदास जी महाराज का जन्म रूपनगर (जावरा) में हुआ और उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र रतलाम का रूपनगर फांटा रहा।
उन्होंने नशा-मुक्त समाज, शिक्षा और गौ-सेवा के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया।
संत श्री कालू बाबा – पशु रक्षक संत
मालवा अंचल के नीमच और मंदसौर क्षेत्र में संत श्री कालू बाबा को पशु रक्षक और चमत्कारी संत के रूप में जाना जाता है।
ग्रामीण समाज में उनकी गहरी आस्था है।
संत श्री भोलाजी महाराज – भजन और सत्संग के माध्यम से समाज जागरण
मेवाड़ क्षेत्र के चित्तौड़गढ़ और भीलवाड़ा में संत श्री भोलाजी महाराज ने भजन, सत्संग और आध्यात्मिक संवाद के माध्यम से समाज को जोड़ा।
संत श्री देवाराम जी महाराज – सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज
मारवाड़ और पाली क्षेत्र में सक्रिय संत श्री देवाराम जी महाराज ने गाडरी समाज में धार्मिक चेतना फैलाने और कुरीतियों के विरुद्ध अभियान चलाया।
संत श्री रामप्रसाद जी महाराज – मानवता और जीव-दया के संदेशवाहक
उज्जैन और धार क्षेत्र में संत श्री रामप्रसाद जी महाराज मानवता, करुणा और जीव-दया का संदेश देने वाले वर्तमान समय के संत हैं।
धनगर समाज का राजकीय एवं शासकीय इतिहास
धनगर समाज का इतिहास केवल संतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस समाज ने शक्तिशाली रियासतें और साम्राज्य भी स्थापित किए।
होलकर रियासत – धनगर समाज की गौरवशाली पहचान
होलकर रियासत धनगर समाज की सबसे प्रसिद्ध रियासत मानी जाती है। इसके संस्थापक सूबेदार मल्हारराव होलकर थे।
इंदौर और महेश्वर इसके प्रमुख केंद्र रहे।
मराठा साम्राज्य के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका
शक्तिशाली सेना और प्रशासन
अहिल्याबाई होलकर का आदर्श शासन
बघेलखंड की रियासतें
बघेलखंड क्षेत्र में शासन करने वाला बघेल राजवंश स्वयं को धनगर/पाल मूल से जोड़ता है।
इनकी जड़ें चरवाहा संस्कृति और बघेल उपनाम से जुड़ी हुई मानी जाती हैं।
विजयनगर साम्राज्य – दक्षिण भारत में धनगर योगदान
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हरिहर और बुक्का राय ने की, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से कुरुबा (धनगर) समुदाय से जोड़ा जाता है।
हम्पी इसकी राजधानी रही और इस साम्राज्य ने हिंदू संस्कृति की रक्षा की।
पाल साम्राज्य – शिक्षा और संस्कृति का संरक्षण
पाल राजवंश (8वीं–12वीं शताब्दी) को भी कई इतिहासकार धनगर समाज की जड़ों से जोड़ते हैं।
इस साम्राज्य ने नालंदा और विक्रमशिला जैसे महान शिक्षा केंद्रों का संरक्षण किया।
निष्कर्ष: धनगर समाज – शौर्य, साधना और शासन का संगम
धनगर (गाडरी / गायरी) समाज का इतिहास भारतीय संस्कृति की एक सशक्त धारा है।
यह समाज संतों की करुणा, शासकों की न्यायप्रियता और योद्धाओं की वीरता—तीनों का प्रतिनिधित्व करता है।
आज भी यह इतिहास समाज को प्रेरणा देता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए गौरव का विषय है।