बीरदेव सिद्धप्पा की प्रेरणादायक कहानी
महाराष्ट्र के यामगे गांव से ताल्लुक रखने वाले बी.टेक स्नातक बिरदेव सिद्धप्पा ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2024 में अखिल भारतीय रैंक 551 हासिल कर एक मिसाल कायम की है
उनकी यह सफलता ClearIAS जैसे सूत्रों द्वारा भी पुष्ट की गई है
बिरदेव जिन्हें "Beerappa Siddappa Doni" के नाम से भी जाना जाता है, मूलतः कुरुबा चरवाहा समुदाय से आते हैं
बच्चों से ही भेड़-बकरी चराने वाले इस गांव में बीरप्पा बचपन में ही शिक्षा के महत्व को समझ गए थे। वर्ष 2024 में यूपीएससी परीक्षा में रैंक 551 पाने के बाद वे भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं
यामगे (कोल्हापुर, महाराष्ट्र) निवासी बिरदेव पारंपरिक कुरुबा (धनगर) चरवाहा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं
वे नानावाडी (बेलगाम, कर्नाटक) में भेड़ चराते हुए भी पढ़ते देखे गए।
उन्होंने मराठी माध्यम के स्थानीय विद्यालय से प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की तथा महाराष्ट्र के पुणे स्थित इंजीनियरिंग कॉलेज से 2020 में बी.टेक (सिविल इंजीनियरिंग) की डिग्री पूरी की
पढ़ाई पूरी होने पर बिरदेव ने 2020-21 में इंडिया पोस्ट में पोस्टमैन के रूप में नौकरी की
इसके बाद मित्रों की मदद से उन्होंने दिल्ली आकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की और अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया
यह उनका तीसरा प्रयास था। पहले प्रयास में वे कट-ऑफ से मात्र 30 अंक कम रह गए और दूसरे प्रयास में 3 अंक से चूक गए थे
निरंतर अभ्यास और दृढ़ निश्चय के चलते तीसरी बार UPSC CSE में सफलता मिली, और रैंक 551 हासिल हुई
उम्मीदवारों के लिए बिरदेव की कहानी एक उज्जवल प्रेरणा है। वर्णित संस्थान व मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उनके परिवार और गांव वालों ने उनके इस सफलता पर जमकर जश्न मनाया
बिरदेव खुद बताते हैं कि परिणाम का ऐलान होने पर वे बेलगाम में अपने चाचा के साथ बकरियां चर रहे थे और चाचा ने उन्हें पीली पगड़ी बांधकर सम्मानित किया
विवेचन के अनुसार उनकी यह उपलब्धि सिर्फ व्यक्तिगत नहीं है, बल्कि ग्रामीण और वंचित समाज के छात्रों के लिए आशा की किरण भी बन गई है
कुरुबा (धनगर) समुदाय की पृष्ठभूमि
बिरदेव जिस कुरुबा समुदाय से आते हैं, वह परंपरागत रूप से पशुपालन-शेफरडरी और कृषि पर निर्भर है
विकिपीडिया के अनुसार ‘कुरुबा’ नाम स्वयं कन्नड़ भाषा के शब्द Kuri (भेड़) से लिया गया है और यह समुदाय मुख्यतः भेड़-बकरी चराने में लगा हुआ था
कुरुबा जाति कर्नाटक की तीसरी सबसे बड़ी जाति है और ऐतिहासिक रूप से इनकी आजीविका में पशुपालन का प्रमुख योगदान रहा है
महाराष्ट्र में इसी समुदाय को सामान्यतः धनगर कहा जाता है। वास्तव में महाराष्ट्र एवं कर्नाटक की जाति विभाजन रिपोर्टों में ‘धनगर समाज’ में कर्नाटक के कुरुबा समुदाय को शामिल किया गया है
इस समुदाय के लोग ग्रामोद्योग और कृषि भी करते हैं, और पारिवारिक देवी-देवताओं में से एक Beerappa (Beerayya) है, जिनकी पूजा वे बड़े श्रद्धा से करते हैं
धनगर/कुरुबा समाज का इतिहास और सांस्कृतिक महत्व भी गहरा है। इंदौर के होलकर परिवार इसी समुदाय से संबंध रखता है
इनके त्यौहारों और लोककथाओं में भेड़-बकरी पालन का चित्रण मिलता है, और Beerappa के साथ-साथ क्षेत्र के अन्य देवताओं जैसे खंडोबा और विठ्ठल की पूजा भी इस समुदाय में प्रचलित है
आधुनिक युग में यह समाज शैक्षिक एवं सामाजिक प्रगति की ओर अग्रसर है, और बिरदेव सिद्धप्पा जैसे उदाहरणों ने इन क्षेत्रों के युवाओं को ऊँची उड़ान भरने की प्रेरणा दी है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि बिरदेव सिद्धप्पा की यह कहानी विश्वसनीय है। उनकी मेहनत और लगन ने एक चरवाहा परिवार के बेटे को सरकारी नौकरी की उच्चतम प्रतियोगिता में उत्कृष्ट स्थान दिलाया
यह उपलब्धि सिर्फ़ बिरदेव का ही नहीं बल्कि पूरे समुदाय और ग्रामीण भारत के लिए अभिमान का विषय बनी है।
स्रोत: ऊपर दी गई जानकारी और तथ्यों को वाजिराम एंड रवि, ClearIAS, India Today, Storypick आदि प्रतिष्ठित स्रोतों से लिया गया है